फ़िल्म रिव्यू : टाइगर जिंदा है

एक आतंकवादी नेता है. घायल हो जाता है. अस्पताल पहुंचता है. अस्पताल में हिन्दुस्तानी नर्सें हैं. आतंकी संगठन उस अस्पताल पर कब्ज़ा कर लेता है. उन्हें बचाना है. मामला देश वाला हो जाता है. टाइगर आता है. सबको लगता था कि टाइगर मर चुका है. लेकिन टाइगर जिंदा है! अंत में क्या हुआ, बताने की ज़रुरत तो है नहीं. सलमान खान की फ़िल्म है. 

फ़िल्म उसी टाइगर के ऊपर है जो ‘एक था टाइगर’ में था. वही ज़ोया है. वही शेनॉय सर हैं. फ़िल्म मार-धाड़ और ऐक्शन से भरपूर है. फ़िल्म में ISIS को ध्यान में रखते हुए एक आतंकवादी संगठन बनाया गया है. कहीं भी इस्लाम का नाम नहीं लिया गया है मगर माजरा समझ में आ ही जाता है. इस आतंकी संगठन के मुखिया को अबू उस्मान के रूप में दिखाया गया है. अबू उस्मान जो देखने में अर्जुन रामपाल सा दिखता है, असल में ईरानी ऐक्टर सज्जाद देलाफ्रूज़ हैं. सज्जाद ने कमाल का काम किया है और सलमान खान के सामने जिस लेवल के विलेन की ज़रुरत है, वो उस खांचे में एकदम फिट बैठते हैं.

ये बात सही है कि सलमान के इर्द गिर्द कौन-कैसा-क्यों होगा, इसे पूरी तरह से जस्टिफाई करना पड़ता है. क्या है कि सलमान खान ऐक्टर नहीं हैं.जिन्हें लगता है कि वो हैं, मसखरे हैं या अव्वल दर्जे के नासमझ हैं. सलमान असल में अंतरिक्ष में 1 करोड़ 30 लाख साल पहले घटी उस घटना का प्रमाण हैं जिसमें दो ब्लैक होल्स आपस में आ मिले थे. उस एक घटना ने अंतरिक्ष को वो रूप दिया जो हम फ़िलहाल देख रहे हैं. हमारी आकशगंगा, जिसके हम नन्हे से एलिमेंट हैं, उसी खगोलीय घटना का परिणाम हैं. सलमान खान स्पेस-टाइम रूपी रबर शीट पर मौजूद एक बेहद वजनी ग्रह हैं जो अपने मास से ऐसा दबाव बनाते हैं कि आजू-बाजू वाले छुद्र पिंडों पर उसकी ग्रेविटी कर्व का असर पड़ता है. ये छुद्र ग्रह उनके साथ काम करने वाले एक्टर्स हैं और हम सभी उनकी फ़ील्ड-ऑफ़-ग्रेविटी के असर से तैयार हुए अंतरिक्ष में रेंगते कीड़े.

प्लैनेट के दबाव से बने कर्व से नए ग्रहों का बदलता रास्ता और सलमान खान!

ग्रैंड एंट्री. ये सलमान की फ़िल्मों का सबसे हाई-पॉइंट होता है. जब हॉल में सबसे ज़्यादा सीटियां बजती हैं. अमूमन सीटियां एक कम सोफ़िस्टिकेटेड ऑडियंस का सूचक होती हैं लेकिन सलमान खान यहीं अपवाद बन जाते हैं. ये आदमी आपके मुंह से जोर की आवाज़ निकलवा के मानता है. और यहीं सलमान अपनी फ़ील्ड ऑफ़ ग्रेविटी को जस्टिफाई कर देता है. हांलाकि अब तक सलमान की एंट्री के मामले में सुल्तान को कोई भी नहीं ‘पछाड़’ पाया है. ट्यूबलाइट में तो सिचुएशन काफ़ी लुल्ल हो गई थी.

सलमान के अलावा फ़िल्म में अंगद बेदी (नो मीन्स नो), परेश रावल (मोदी जी के बॉलीवुड मुखबिर), कुमुद मिश्रा (सुल्तान के गुरु) भी हैं. ये लोग दिखते रहते हैं बीच-बीच में.

फ़िल्म, जैसा कि ज़ाहिर ही था, ऐक्शन फ़िल्म है. इसे बनाते वक़्त ये कोशिश की गयी है कि पुरानी हिंदी ऐक्शन फ़िल्मों जैसा कुछ ख़ास रिपीट न किया जाए. इसलिए फ़िल्म शुरू होती है और आपको ‘जेसन बोर्न’ की याद आने लगती है. रॉबर्ट लडलम का बनाया किरदार जिसे स्क्रीन पर मैट डेमन ने ‘खेला’ था. जासूसी और एजेंट टाइप फ़िल्मों को फ़िल्माने के तरीकों में जेसन बोर्न की सीरीज ने पैमाने सेट किये हैं. टाइगर जिंदा है शुरू होती है और अप बंध जाते हैं. लेकिन तभी एंट्री लेती है कटरीना कैफ़ और उनकी हिंदी. एक सधी हुई ढिशुम-ढिशुम और डिज़ाइनर बंदूकों, स्नाइपर्स, ईरानी आतंकियों वाली फ़िल्म में लव स्टोरी शुरू हो जाती है. ऐसा लगता है जैसे रात 12 बजे एफ़टीवी देखने का प्रोग्राम बनाए ‘नए-नए लड़कों’ को मालूम चले कि जिसके घर रात को  मजमा जुटने वाल था, उसके घरवाले एक दिन पहले ही वापस आ गए. गाना-वाना शुरू हो जाता है. गाना खूब फ़ेमस हुआ है, इरशाद कामिल ने लिखा है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है न यार कि कहीं भी ठेल दो. लय बिगड़ जाती है भाई. कोई सलमान की ऐसी पिक्चर बनाओ जिसमें खाली ऐक्शन हो. बढ़िया एकदम धांसू वाली जासूसी हो और एक सांस में आदमी देख जाए. माने, ज़रूरी थोड़ी है कि लव स्टोरी हो ही. हो भी तो गाना हो. यश राज की पिक्चर है तो क्या हुआ? सलमान की पिक्चर है तो क्या हुआ?


मेरा तो जी सबसे ज़्यादा तब घिनाया जब 2 मिनट पहले उठी कटरीना कैफ़ बिना मंजन किये नाश्ता करने लगी. समझ ही में नहीं आया कि उसको ब्रश करवा देते फिर खिलाते तो क्या समस्या थी?


फ़िल्म में लॉजिक के नाम पर कुछ भी नहीं है. कुछ भी नहीं. शेनॉय कभी भी अमरीका जा रहे हैं, कभी भी पीएमओ में बैठे हुए हैं. कभी भी कुछ भी चल रहा है. अमरीका से यूं ही बात हुई जा रही है. अमरीका कुछ भी कहे जा रहा है. पहले वो एक हफ्ते का समय दे देता है. बाद में एक दिन का और मांगा गया तो वक़्त की इस कदर पाबंदी हो गयी कि सेकंड नाप-नाप के बम गिराए जाने लगे. फ़िल्म में माहौल बनाया गया है. बखूबी बनाया गया है. सीआईए, तिरकित, मोसुल जैसी बातें की जाती हैं. ये कीवर्ड्स उछाल दिए जाते हैं. जो भी ट्विटर पर एक-दो विदेशी न्यूज़ एजेंसियों को फॉलो करता होगा, उसे समझ में आ जाएगा कि कुछ तो बड़ा चल रहा है बॉस. इसलिए अगर आप विदेशी पॉलिटिक्स और खासकर मिडल ईस्ट में जो भी चल रहा है की जानकारी रखते हैं तो वो वाला लिफ़ाफ़ा लेकर जाइए जो फ्लाइट में उल्टी आने पर इस्तेमाल करने को कहा जाता है.


फ़िल्म न किसी ऑपरेशन के ऊपर है. न किसी रेस्क्यू मिशन के ऊपर. फ़िल्म पूरी तरह से भाई के ऊपर है. फ़िल्म इसलिए बनाई गई है कि हमें याद दिलाया जा सके कि भाई फ़िल्म में कुछ भी कर सकते हैं. कुछ भी. आतंकी हों चाहे भेड़िया. भाई सबको बराबर मारते हैं. भाई ने रॉ के सर्वर हैक किये हुए थे. भाई चाहते हैं तो वो आपको मिलते हैं. भाई नहीं चाहेंगे तो आप घंटी घनघनाया कीजिये. भाई अपनी फ़िल्मों में वही हैं जो ‘भ’ अक्षर से शुरू होता है. (डायरेक्ट भगवान लिख दूंगा तो कहोगे कि आहात होने जैसा लग रहा है. इसलिए सांकेतिक.) प्लस पॉइंट ये है कि भाई राष्ट्रभक्त हैं और एक जगह उन्हें भाभी (कटरीना) बताती हैं कि उनका काम ‘वर्ल्ड पीस’ का है. इतने सारे पॉज़िटिव एक साथ इकट्ठे हो जाते हैं कि आपके ऊपर इस फ़िल्म को पसंद करने का नैतिक दबाव आ जाता है. आप अगर दिमाग में भी सोचें – ‘ठीक थी लेकिन यार…’ तो घर जाकर शीशे में खुद को देख नहीं पाएंगे. 


अगर जीवन में बहुत त्रासदियां हैं, सब कुछ भारी हो रहा है, सीने पर बोझ सा मालूम देता है, कुछ हल्का करना है तो ये फ़िल्म देख आइये. ये फ़िल्म वही काम करेगी जो पोर्न देखते वक़्त आपका दिमाग करता है. आप अलग दुनिया में पहुंच जाएंगे, साथ ही आपको ये भी मालूम रहता है कि आपका बड़ी ज़ोर का कट भी रहा है. म्यूज़िक-व्यूज़िक बढ़िया है. स्वैग से स्वागत अंत में आता है इसलिए आप बच जाते हैं. अच्छी बात ये है कि दरवाज़ा सिर्फ राष्ट्रगान के वक़्त बंद होता है. इस गाने के लिए भी होता तो मुसीबत होती.

फ़िल्म देखने जाइए. परिवार के साथ. मजे लेंगे सब लोग. बुद्धि लगाने वाले अपने विवेक से काम लें. फ़िल्म खूब कमायेगी, ये तय है.

बाकी, भाई रोक्स! 😉

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