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पुत्र की दीर्घायु होने का वरदान के लिए जिउतिया का उपवास माताओं ने रखा

आरा : पुत्र की लंबी आयु व उत्तम स्वास्थ्य के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत माताओं ने रखा. पूरी निष्ठा एवं शुद्धता के साथ कई स्थानों पर जिउतिया व्रत से जुड़ी कथाओं को भी श्रद्धालुओं ने सुना. तथा अपने पुत्र की दीर्घायु होने की कामना की. आरण्य देवी मंदिर के महंत मनोज बाबा ने बताया कि जीउतिया व्रत काफी नियमो वाला होता है. व्रती महिलाओं को पानी भी ग्रहण नहीं करना होता है. उन्होंने बताया कि वंस के दीर्घायु होने के साथ ही वंश में बढ़ोतरी के लिए भी इस व्रत को किया जाता है. व्रती महिलाएं पूरे दिन कुछ भी तोड़ या काट नहीं सकती है. ऐसा करने से व्रत अधूरा माना जाता है.पूरे दिन अनुष्ठान के बाद शाम के समय पवित्र होकर संकल्प के साथ शाम को गोधुली बेला में गाय के गोबर से अपने आंगन को लीपने के बाद पूजा की गयी है. इस दौरान मिट‍्टी तथा गाय के गोबर से चिल्ली या चिल्होडि़न (मादा चील) व सियारीन की सांकेतिक मूर्ति बना कर उनके मस्तको लाल सिंदूर से सजाया महिलाओं ने सजाया . उन्होंने बताया कि हर विवाहित महिला जिनको संतान है, उनको यह व्रत करनी चाहिए.

क्या है इससे जुड़ी कथाएं

मंदिर के महंत मनोज बाबा एवं संजय बाबा ने आरण्य देवी मंदिर में आई श्रद्धालुओं को जिउतिया से जुड़ी कथा सुनाई. आप सभी भी ध्यान से सुनिए. वैसे तो जिउतिया से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित है.एक बार की बात है दोनों ने सामान्य महिला के जैसे जितिया व्रत करने का संकल्प लिया और माता शालीन बहन के पुत्र  भगवान् जीऊतवाहन की पूजा करने के लिए निर्जला व्रत रखा भगवान् की लीला कुछ ऐसी हुई की उसी दिन उस नगर के एक बहुत बड़े व्यापारी का मृत्यु हो गयी.

जिसका दाह संस्कार उसी मरुस्थल पर किया गया।  वह काली रात बहुत विकराल थी। घनघोर घटा बरस रही थी । बिजली कडक रही थी बादल गरज रहे थे। जोरों की आंधी तूफ़ान चल रही थी। सियारिन को बहुत जोर की भूख लगी थी  मुर्दा देखकर वह अपने आपको रोक न सकी और उसका व्रत  टूट गया ।  परन्तु चील ने नियम एवं श्रद्धा के साथ दूसरे दिन कथा सुनने के बाद पारण किया. तब से लेकर यह पुत्र के दीर्घायु होने की कामना को लेकर पूजा अर्चना की जाती है. आरण्य देवी मंदिर से लेकर तमाम मंदिरों में तथा घरों में माताओं ने कथा सुनी और पूरी भक्ति भाव के साथ पूजा अर्चना की.

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